
तो इस सुबह मैं एक सुन्दर, सुनहरे, साफ़ दिन को उठा, और दिन शुरू करने के लिए, जैसा की मैं अक्सर करता हूँ, मैंने कुछ भक्ति संगीत लगाया. शुरू शुरू में एक गाना केवल परमेश्वर से प्रेम रखने के बारे में था, कैसे यह करने के लिए समय लगता है, उससे हर रोज़ प्रेम रखने के लिए.
और मैंने इस बारे में सोचा, कितना आसान है यह, कैसे यह लगभग घिसा-पिटा सुनाई देता है, हम में से ज्यादातर के कानों को बेस्वाद. और फिर भी परमेश्वर ने मूसा से कहा, और येशु ने इसे दोहराया, की यह वास्तव में ईश्वरीय आज्ञाओं में सबसे पहली है. किसी ने येशु से पुछा की पहली ईश्वरीय आज्ञा क्या थी और उसने कहा, “और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना. और दूसरी यह है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना: इस से बड़ी और कोई आज्ञा नहीं.” (मरकुस १२:२९-३१)
“हाँ, हाँ मार्क; हाँ, हाँ! ये हम सब जानते हैं! हमने यह सन्डे स्कूल में या अपनी नानी से सुना है. लेकिन…”
क्या यही आसान प्रतिक्रिया नहीं है? मैं अभी यही सोच रहा था की कितना आसान है दुनिया की जरूरतों, चिंताओं और भयावहता पर ध्यान केन्द्रित हो जाना और सोचना की उस दूसरी ईश्वरीय आज्ञा का पालन करना कितना मौलिक है, अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना. यह इतना अत्यावश्यक, इतना गायब और इतना बेतहाशा जरूरी है. लेकिन फिर भी, यह दूसरी ईश्वरीय आज्ञा है, पहली नहीं.
“प्रेम कभी टलता नहीं.” (१ कुरिन्थियों १३:८) “प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता.” (रोमियो १३:१०) “इन में सब से बड़ा प्रेम है.“ (१ कुरिन्थियों १३:१३) ये सब कुछ अक्सर सुनने को मिलते हैं कुछ घेरों में, वे घेरे जिनमें मैं और कई अन्य घूमते हैं. और ये सब सच है; हमारे समय में हमारे साथी इंसान के लिए साधारण प्रेम इतना अधिक गायब है और बेतहाशा जरूरी है. येशु ने अपनी वापसी के ठीक पहले के समय के बारे में कहा भी था,”और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा.” (मत्ती २४:१२) पक्का अभी के जैसा लगता है, है ना कि?
लेकिन इस सुबह जो ख्याल मुझे आया वो यह है कि कैसे यह सब बहुत आसान है हम में से किसी के लिए भी अपने पड़ोसी से प्रेम रखने को खुद परमेश्वर से प्रेम रखने से ऊपर रखना. और शायद मुझे उस कहानी का उदहारण देना चाहिए जो मैंने कुछ समय पहले बतलाई थी “तीन उँगलियों” के बारे में जब मैं जो यहाँ लिख रहा हूँ उस पर आते हैं तो. मैं इस बारे में खुद को अपराधी महसूस करता हूँ और देखता हूँ कि कभी कभी मैं हमारी पीढ़ी में मानवता की ज़रूरतों से इतना हिल गया हूँ कि मैं परमेश्वर से प्रेम रखने से ज्यादा, दुनिया को उसके लिए जितने की ज़रूरत में फँस गया हूँ.
जैसा की येशु ने कहा था,“चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते.” (मत्ती २३:२३ब) हमें परमेश्वर और अपने पड़ोसी दोनों से प्रेम रखना चाहिए.
कई वर्ष पहले मेरा विश्व गिरजाघर परिषद् के साथ संक्षिप्त संपर्क हुआ था और मैंने कुछ मुल्य्वर्गों का विवरण करने वाली शब्दावली सीखी, “खड़े” और “आड़े”. “खड़े” उन भक्तगणों का विवरण करती है जिनका मुख्या ध्यान दिव्य बातों में है, परमेश्वर और येशु में और परमेश्वर के साथ हमारे रिश्ते और उसकी भक्ति में. “आड़े” दूसरी आज्ञा पर ज्यादा ध्यान देते हैं, उससे मिले ज़िम्मे पर, कि हम अपने पड़ोसी से अपना सा प्रेम रखें. ये वे लोग हैं जो अक्सर मानवीय सहायता राहत में और अपने भाई लोगों के लिए अपनी जान न्योछावर करने में मोर्चे पर आगे रहते हैं या जोश के साथ हमारे समय के सामाजिक मामलों में व्यस्त रहते हैं.
लेकिन अवश्य ही, इन दोनों को अलग अलग नहीं बल्कि मिलकर काम करना चाहिए. और मैं समझता हूँ की सिर्फ परमेश्वर ही खुद हमें सही मिश्रण प्राप्त करा सकते हैं. इसी लिए पवित्र आत्मा की जीवित मौजूदगी का होना, इतना सहायक, इतना आवश्यक है, हमारे अंदर जाग्त्क और रोज़ाना काम करती हुई. हम अपनी कमज़ोर बुद्धि से सही करने की कोशिश कर सकते हैं. लेकिन हर काम इतना ज्यादा बढ़िया होता है अगर हमारे अंदर उसकी पवित्र आत्मा हमें “सब सत्य का मार्ग बताता है ” (यूहन्ना १६:१३), यहाँ तक कि व्यक्तिगत रूप से और रोज़ाना हमें बताने में कि कब हमें ज़रूरत है “अलग किसी स्थान में आकर थोड़ा विश्राम” (मरकुस ६:३१) और सिर्फ परमेश्वर से प्रेम रखने पर सच्चा ध्यान देने की.
असल सच तो यह है कि “तुम मालिक का काम मालिक की शक्ति के बिना नहीं कर सकते और उसे हासिल करने के लिए मालिक के साथ तुम्हारा समय बिताना जरूरी है. यह तेल वाले दिये की तरह है.
दुनिया के खोये हुए और जरूरतमंदों के लिए हमारा सारा प्यार और काम परमेश्वर की पवित्र आत्मा की ओर से आना चाहिए, न की हमारे खुद से. नहीं तो ये एक तेल बिना जलती हुयी बाती की तरह होगा. यह काफ़ी जल्दी ख़त्म हो जाता है और काफ़ी धुयाँ होता है. लेकिन अगर हम पवित्र आत्मा के तेल में सोखे रहें, उससे सच्चे प्रेम द्वारा, फिर हमारे दियों में दुनिया की रौशनी होने के लिए जैसा कि वो चाहता है हम हों, पर्याप्त तेल रहेगा.
कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर एक बड़े डंडे के साथ हमारा पीछा करता हुआ, किसी तरह का एक निर्दयी राक्षस है. परन्तु वास्तव में वह प्रेम है और प्रेम में वह हमें स्वर्ग में प्रवेश कराने की कोशिश में लगा है.
इसका एक सुन्दर चित्रण वह कहानी है जो येशु ने “उड़ाऊ बेटे” की बताई जो दूर किसी देश अपनी मन मर्ज़ी करने के लिए अपने पिता को छोड़ चला गया. येशु ने बताया, की कुछ समय बाद, बेटा “अपने आपे में आया” (लूका १५:१७) और उसने शर्म के साथ अपने पिता के घर लौटने का फैसला किया. और पिता, जो परमेश्वर को दर्शाते हैं, उन्होंने क्या किया? येशु ने कहा, “वह अभी दूर ही था, कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा.“ (लूका १५:२०). हम सभी के लिए जो गुमराह हैं परमेश्वर के प्रेम की कितनी कोमल तस्वीर है ये.
मूसा के बाद परमेश्वर के लोगों का नेता, यहोशू ने उनसे कहा, “इसलिये अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम रखने की पूरी चौकसी करना.” (यहोशू २३:११). दूसरों से प्रेम रखना बड़ी चीज़ है, परमेश्वर की आज्ञा है और उसकी पवित्र आत्मा हमारे दिलों में एक अविश्वसनीय प्रेम डाल देगी जो वह चाहता है कि हमारे में हो. लेकिन हमारे पड़ोसियों के लिए हमारे प्रेम को उस के लिए हमारे प्रेम से प्राथमिकता देना, यह परमेश्वर के सेवकों के लिए लुभाव हो सकती है.
परमेश्वर हम सब की मदद करें. क्योंकि अगर हम सुई को दूसरी तरफ़ घुमने दें कि हम उसके बन्दों की बेपरवाही कर अपना सारा समय उसकी पूजा में व्यतीत करें, तो फिर वह केवल एक और गलती है दूसरी ओर जाने की. मैं कुछ लोगों को जानता हूँ जिन्होंने ऐसा किया है, जो एक समय सचमुच कार्यरत थे दुनिया को येशु के लिए जीतने में. पर अब वे अपना अधिकतर समय अकेले घर पे बिताते हैं निजी पूजा और भक्ति में.
कभी कभी परमेश्वर से प्रेम रखना सिर्फ उसके वचन से प्रेम रखना और उसे हमसे सचमुच कुछ बोलने के लिए समय लेना हो सकता है. यिर्मयाह ने कहा, “जब तेरे वचन मेरे पास पहुंचे, तब मैं ने उन्हें मानो खा लिया, और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनन्द का कारण हुए.” (यिर्मयाह १५:१६). शुक्र है की हम सुरक्षित हो सकते हैं कि “परमेश्वर प्रेम है” (१ यूहन्ना ४:८) और कि “हम इसलिये प्रेम करते हैं, कि पहिले उस ने हम से प्रेम किया” (१ यूहन्ना ४:१९). “परन्तु यदि कोई परमेश्वर से प्रेम रखता है, तो उसे परमेश्वर पहिचानता है” (१ कुरिन्थियों ८:३)
लेकिन हमारी सारी ईसाई सेवा में, दुनिया की इस समय की अत्यंत दूर्दशा की हमारी चिंता में, पृथ्वी और परमेशवर की सृष्टि की चिंता में, जो भी पीड़ा में लगती है, यह याद रखना अच्छा है (इस समय अपने खुद की तरफ़ तीन उँगलियाँ करते हुए) कि येशु ने हमें बताया था, “क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना १५:५) हमारे परमेश्वर से प्रेम रखे बिना और उसके साथ समय बिताए बिना, हमारी प्राथमिकताएं गड़बड़ा जायेंगी. और यह वैसा नहीं होगा जैसा होना चाहिए, उसके या हमारे या इस दुनिया के ज़रूरतमंदों के लिए, या हमारी प्रिय पृथ्वी खुद के लिए.















तो मेरे लिए, परमेश्वर के किसी के अंदर होने की सबसे बड़ी निशानियों में से है वह सची प्रेमभावना, असल शामिल करने वाला प्रेम, और निष्ठावन इंसानी प्यार जो वह अपने लोगों के दिलों में डाल सकता है.दुःख की बात यह है कि यह हमेशा नहीं होता पर फिर किसी किसी समय होता भी है. तुम उसे एकदम महसूस कर सकते हो. वे तुम्हें केवल इसाई होने के नाते नहीं प्यार करते; वे असल में तुम्हें चाहते हैं और तुम्हारे संग घूमना चाहते हैं और वे जो करते हैं उसमें तुम्हें शामिल करना चाहते हैं. दुनिया की सारी धार्मिकता सची इसाई प्रेमभावना और अपनेपन की जगह नहीं ले सकती. और कई बार किसी भी चीज़ से ज्यादा,प्यार की वह दिखाई देने वाली निशानी ही लोगों को चाहिए होती है और जिसका उनपे असर होता हैं.




यह लगभग 604BC का समय है जबकि दानिएल शायद उस समय अपनी किशोर अवस्था में था. उसका देश यहूदा (जो उस समय कहलाता था) 800 


बेबीलोन अपने समय में वैसा ही आदर और प्रेरणादायक शहर था जैसे कि रोम और एथेंस. या फिर आज के आधुनिक शहरो के जैसा. बेबीलोन सोने का शहर कहलाता था, — शिक्षित, आधुनिकतावादी, शक्तिशाली – उस समयों के लिए विश्व का केंद्र और लगभग अजेय था.
ऐसा प्रतीत होता है कि लोग पिछले २६०० वर्षों में भी नहीं बदले क्योंकि उसके सलाहकारों ने उत्तर दिया:
“… मैं यह आज्ञा दे चूका हूँ कि यदि तुम फल समेत स्वप्न को न बताओगे तो तुम टुकड़े–टुकड़े किये जाओगे, और तुम्हारे घर फुंकवा दिए जाएँगे. पर यदि तुम फल समेत स्वप्न को बता दो तो मुझसे भांति–भांति के दान और भारी प्रतिष्ठा पाओगे”.

















” (दानिएल ५:२७) और इस प्रकार बेबीलोन का राज्य medes और persian को सौंप दिया गया.



जोकि 1000 वर्षों तक चलता रहा, इस पूर्वी भाग का मुख्यालय Constantinople था जोकि आज Istanbul कहलाता है. अत: दो पाँव, चौथे सम्राज्य के दो भाग जैसा कि हमने देखा यह दानिएल और नबुकद्नेसर को लगभग ५०० वर्षो पूर्व ही दिखा दिए गए थे.
और जैसे जैसे उसकी वृद्धा अवस्था आने लगी उसे स्वत: ही स्वप्नों और आत्मिक अनुभवों के द्वारा ज्ञान प्राप्त होने लगा जोकि सम्पूर्ण बाइबिल में आश्चर्यचकित कर देने वाले थे. आगे हम दानिएल कि पुस्तक के ७ वे अध्याय का अध्ययन करेंगे. यदि अपने दानिएल के २ रे अध्याय के अध्ययन में रूचि पाई है तो मैं आशा करता हूँ कि अगला अध्ययन आपको और अधिक रुचिकर लगेगा.